हमारी हैसियत
||हमारी हैसियत ही अजीब है क्या करें सामने वाले को देखकर लहरों की तरह बढ़ती और घटती है निर्धन को भी नमन करती है धनी को भी दुत्कार जाती है दिल की गहराई पर सब न्योछावर करती है और बेगैरत पर तिजोरियाँ बंद करती हैं हैसियत दिल की तबियत है जो दिल को देख बदलती है कभी जंगल में भी मोमबत्ती से मंगल करती है कभी रौशनी के पुञ्ज को उठा दूर फेंकती है अरे! ये हैसियत तो नाज नखरों की बेटी है कोई रिश्तों पर अकड़ती है कोई नोटों पर अकड़ती है जो जिस पर अकड़ती है वो उसके साथ ही अकेले रह जाती है ||